Samakālīna jīvana sandarbha aura Premacanda

Front Cover
Pīyūsha Prakāśana, 1980 - Authors, Hindi - 144 pages
0 Reviews
Contributed articles on the life and works of Premchand, 1881-1936, Hindi litterateur.

From inside the book

What people are saying - Write a review

We haven't found any reviews in the usual places.

Contents

सन्दर्भ और अर्थबला
7
२२० डरे रामजी त्रिपाठी
प्रासंगिकता का प्रान

2 other sections not shown

Common terms and phrases

अधिक अपना अपनी अपने अब आदि इन इस इसलिए इसी उनका उनकी उनके उन्हें उन्होंने उपन्यास उर्दू उसका उसकी उसके उसे एक ऐसा ओर कर करता है करते हैं करने कहा कहानियों कहानी का कारण कि प्रेमचन्द किया किसान किसी कुछ के रूप में के लिए के साथ केवल को कोई क्या क्योंकि गये गाँव गोदान गोबर चेतना जब जा जाता है जाती जीवन जैसे जो तक तरह तो था थी थे दिया देता दोनों नहीं है ने पर परम्परा पहले पाकिस्तान प्रेम प्रेमचन्द की बहुत बात बाद भारत भारतीय भी महात्मा गांधी में प्रेमचन्द मैं यथार्थ यदि यह या युग रचना रहा है रहे लेकिन लेखक लेखकों लेखन लोग लोगों वह वाले वे शोषण संघर्ष सकता है सकते समाज सामने सामाजिक साहित्य में सूरदास से हम हमारे हिन्दी ही हुआ हुई हुए है और है कि है जो है तो है है हैं हो होगा होता है होती

Bibliographic information