Bihārī-bhāshya: mahākavi Bihārī-Satasaī kā prāmāṇika bhāshya

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Aśoka Prakāśana, 1968 - Poetry - 446 pages
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अक्षर ३६ अत अथवा अधिक अनेक अन्य अपनी अपने अर्थ अर्थ-हे अर्थात् अलंकार है इस इसी उस उसका उसकी उसके उसी उसे ऋतु एक ओर कर रही है करके करती करने के कह कार्य किन्तु किया है किसी की कृष्ण के कारण के लिए के साथ को को देखकर कोई क्योंकि गई है गया है गुरु गुरु १२ छन्द छेकानुप्रास छेद अक्षर जब जाता है जाती जाने जिस जो तथा तुम तू तो था दिया दोनों द्वारा नहीं नायक के नायिका के ने नेत्रों पर प्रकार प्रति प्रसंग-नायिका प्रियतम प्रेम फिर बात बार भाव यह है भी मन मान में मेरे मैं यमक यह है कि यहाँ रहा रहीं रूप लघु लत लाल वर्ण वर्णन होने से वह विशेष वे शब्द शरीर शोभा समय ही हुआ हुई हुए है और है है हैं हो होकर होता है होती होने के कारण

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