Patthara ke sanama

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Subodha Pkeṭ Buksa, 1966 - Hindi fiction - 110 pages
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अपना अपनी अपने अब आई आज आप आया आँखों इस उठा उठी उन्हें उस उसका उसकी उसके उसने उसे एक ऐसा और प्रतिमा और वह कमरे कर करते करने कह कहने कहा क्या क्षण-भर का कि किया किसी की ओर कुछ कुर्ती के लिए के लिये के साथ को कोई गई गये गीत चली चाय चेहरे जब जा जाने जो डाइरेक्टर तक तरह तुम तुमने तुम्हारे तुम्हें तू तो थीं थे दिया दी दे देखा दो दोनों नहीं नाम पडी पर परन्तु प्यार प्रतिमा के प्रेम पास फिर बात बोला भी मत मधुकर ने मधुम माँ मुझे मेरी मेरे में मैं मैंने मोती यह रचना रह रहा था रहा है रही रहीं थी रहे लगा लगी ललिता लिया ली वे शरद ने शरीर सकता सकती स्वर सामने साहब से ह्रदय हाथ ही हुआ हुई हुए हूँ है और है है हैं हो गई हो गया हो रहा

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