Gandha aura parāga

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Ātmārāma, 1973 - Hindi poetry - 101 pages
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अगणित अनुभव अन्तर में अपना अपनी अपने अम्बर आज इन इस उर उस दिन एक ऐसा ऐसे और कई कब कभी करता कवि कह का कि किसी की कुछ के लिए को कोई कोलाहल क्या क्षण क्षमता गंगाजल गए गहरी गीत चाहे जग जब जाती जाने जितना जिस जीने जीवन के जीवन में जो तक तब तुम तू तेरे तो था दीप दूर दे देख दो दोनों नहीं है नीर ने पथ पर पास पीडा प्यार प्रिय है फिर भी बन बनकर बना बात बार भर मंजिल मत मधु मधुर मन है मस्ती मादक मुझ मुझको मुझसे मुझे में भी में है मेरा मेरी मेरे मन मैं मैंने यदि यह युग ये रहा रही है रहे रा रात ले वह वाले विश्वास विष सदा सावन सूनापन से स्वयं स्वर स्वीकार हम हर हार हित ही हुआ हुई हूं हृदय है जीवन है मेरे है मैं है है हैं हो

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