Kaṛiyām̆ aura anya kahāniyām̐

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Sarasvatī Presa, 1957 - Short stories, Hindi - 174 pages
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Contents

कडियाँ
हरसिगार २
दोहरा ९

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अपनी अपने अब अभी आगे आज आया इतना इन इस उन की उन्हें उस का उस की उस के उसने उसी उसे एक एकाएक और कभी कमला कर के करता करने कह कहा कहीं काम कि किन्तु किया किसी की ओर की तरह कुछ कुछ नहीं के लिए को कोई क्या क्यों गयी गये घर चला जब जा जाती जाने जिस जीवन जो तक तब तुम तो थी थे दिन दिया दे देख कर देखा देर दो नहीं है ने पर पहले पास प्रभाकर फिर बहुत बात बार बाहर बोला भी भी नहीं मन मानों मुझे में मेरा मेरी मेरे मैं मैंने यह या याद रजनी रतन रह रहा था रहा है रही रहीं रहे लगा लगी लिया ले लेकिन वह वहीं वे शायद शेखर संसार सकता सत्य सब समय सूरदास से स्वर हाथ ही हुआ हुई हुए हूँ है कि हैं हो कर हो गया होगा होता होती

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