Kanupriyā

Front Cover
Bhāratīya Jāpītha Prakāśana, 1965 - 76 pages
0 Reviews

From inside the book

What people are saying - Write a review

We haven't found any reviews in the usual places.

Contents

Section 1
Section 2
Section 3

2 other sections not shown

Common terms and phrases

अनन्त अपनी अपने अपने को अब असर आज आम के इतिहास इन इस उस उसी उसे एक और तुम और मैं कनु कभी कर करती कहा है का कि मैं कितनी बार की तरह कुछ के के लिए केवल को कोई कौन है क्या क्यों क्षण खड़े गया है गयी हूँ गये चारों ओर जब तुमने जा जाना जिसे जिस्म जो तक तन तुम मेरे तुमने तुमने मुझे तुमसे तुम्हारे तुम्हें तो तो मैं था थी दिन दिया है दो नहीं नहीं आयी नहीं है नीचे ने पर प्यार प्रगाढ़ प्रिय फिर बन बार-बार बीर भय भर भी मात्र मुझे में में हूँ मेरा मेरी मेरे मैंने मैने यमुना यह या ये रही हैं रा लिया ले लौट वह वाराणसी शब्द सब समझ समय समुद्र सारे सिर्फ सुनो सृष्टि से सो ही हुआ हुई हुए हूँ और हूँ कि है और है कि है जो होकर

Bibliographic information