Apaharaṇa: Eka sāmājika upanyāsa

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Bhāvanā Prakāśana, 1973 - 180 pages
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अचानक अन्दर अपने अब अभी अमर आई आगे आप आया आवाज आश्चर्य इस उठा उठी उत्तर उस उसका उसकी उसके उसने उसे एक और फिर कमरे कयों कर कह कहते कहा का किया किसी की ओर की पत्नी ने कुछ के चेहरे पर के पास के लिए को कोई क्या खडा खडी खिड़की गई गये घर चाय जब जा जाने जैसे जो जोर ठीक तक तुम तो था कि थे दरवाजे दिया दी दूसरे दृष्टि से दे देख देखता देखा दो दोनों नंदिनी नन्दिनी के नहीं पडी पर विकास पूछा बगल बरामदे में बात बार बाहर बोल बोल उठा भाव भी मन मस्तिष्क मीना ने मुझे मेज मैं यह ये रह रहा था रही थी रहीं रहे रुक लगा लगी वकील की पत्नी वकील ने वह विकास ने संभवत सका सच सब सामने साहब सिर सुनाई स्पष्ट स्वर में हाकी हाथ ही हुआ हुई हुए हूँ है हैं

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