Sapanā abhī bhī

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Vāṇī Prakāśana, 1993 - Poetry - 102 pages
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अपनी अपने अब इन इस उन उस उसकी उसके उसने उसी उसे और कब कभी कर करता करने कहा कहाँ कहीं का कि की तरह के पास के लिए को कोई क्योंकि क्रि खामोश खुद गया गयी गये घर चारों छोर जपने जब जल जहाँ जा जाता है जाती जाते जाने जाम जाय जाया जाये जिमी जिसे जो तक तन तुम तुमने तुम्हारी तुले तो था थी थे दिन दिया दिये देर दो धर्मवीर भारती नवम्बर नहीं नाम ने पर पार प्यार फिर फूल बच्चे बया बरसों बार बी भी मगर मत मन मारिशस मुझे में मेरे मैं मैंने यया यह यही यहीं या याद ये रहा रहीं रहे हैं रात राह लड़की ले लोग वह वहुत वि वे शब्द शु सच सब समुह साइकिल साथ सिर सिर्फ से हम हर हवा हाथ ही हुआ हुई हुए हुजा हूँ है एक है और है तो हैं हो

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