Bhāratvāṇī

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Prakāśana Vibhāga, Sūcanā Aura Prasāraṇa Mantrālaya, Bhārata Sarakāra, 1963 - Poetry - 204 pages
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Collection of poems broadcast over All India Radio.

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अपना अपनी अपने अब असम आई आज आया इस उस उसका एक ऐसा ओर और कब कभी कर करता करते कहीं का कि किन्तु किया किसी की कुछ के के लिए कैसे को कोई कौन क्या क्यों गई गए गगन गया गीत छाया जग जब जल जहां जाए जाग रहा जाता जाती जीवन जैसे जो तक तब तुम तुमने तुम्हारी तू तेरी तेरे तो था थी थे दिन दिया दे देख देश दो धरती नई नए नया नव नहीं नहीं है निज नूतन ने पथ पर पार प्राण फिर फूल बन भगवतीचरण वर्मा भर भारत भी मन मां मानव मुझे में मेरा मेरी मेरे मैं मैंने यदि यह यहां ये रहा है रहीं रहे रात रूप रूपान्तरकार रे ले वन वह विश्व सदा सब सभी सा सी सुन्दर सृष्टि से हब हम हर हरिवंशराय बच्चन हाथ ही हुआ हुई हुए हूँ हे हैं हो होगा होता

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