Āja taka kī: Hindī-kavitā, '61-'66: samakālina Hindī-sāhitya kā eka taṭastha adhyayana

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Srī Gaṇapata Prakāśana, 1967 - Hindi poetry - 94 pages
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This book was written by my father when he was SP Bhagalpur in Bihar India

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१९६६ अनुभूति अनेक अपनी अपने अब आई आज इन इस इसकी इसके इसमें इसलिए इसलिये इसी ई० उनके उर्वशी एवं कथा कबीर कम कर करता करने कवि कवि की कविता के कविता में कवियों क्या का काव्य काव्य की की कुछ के रूप में को गई गया गये गीत चेतना जब जा जाती है जीवन जैसे जो तक तथा तुक तो था थी थे दर्शन द्वारा दिनकर दी दो दोनों नई नहीं है निराला ने पर परन्तु प्रकार प्रति प्रभाव फिर बहुत बात बाद बांसुरी बी भवानी प्रसाद भारत भेरी माखनलाल मिश्र में एक में भी मैं यह यही या युग ये रचना रचनाओं रस रहा है रही रहे लिये वर्तमान कविता वह व्यक्त विवेक शक्ति शब्द सकता है सकती सदी सभी समाज स्वयं स्वर साथ साहित्य से हम हमारे हिन्दी कविता ही नहीं ही है हुआ हुई हुए हूँ है और है कि हैं हो होता होती है

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