Vigyanbhikshu Kein Vedant Siddhant

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Kanishka Publishers, Distributors, 1993 - Philosophy - 178 pages
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Study on the philosophy of Vijānabhikshu, 16th cent.

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Contents

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अत अता अपनी अपने अभेद आचार्य आत्मा आदि इन इस प्रकार इसी ईश्वर उनका उनके उन्होंने उपाधि उस उसका उसकी उसी एक और कर करके करता है करते करते हुए करने कहा का कार्य किन्तु किया के अनुसार के रूप में के लिये को क्योंकि क्रिया गया क्रिया है गया है चाहिये जगत जगत् जाये जीब जीव जैसे जो ज्ञान तथा तो थे दर्शन दिया दोनों द्वारा नहीं है नहीं होता ने पकाते पर भी पवार पू पू० पृ पृ० प्रकृति बह बहा की बुद्धि भिक्षु भिल भेद भेदाभेद महीं मानते मानने माना में भी मोक्ष यदि यह या ये योग रहता रूप से विचार विज्ञानामृतभाव्यम विष्णु वे वेदान्त सभी समय सम्भव सिद्ध से ही स्थान स्वीकार ही है है कि हैं हो जाता है होकर होता है होती होते होने के कारण होने पर

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