Vaishali Institute Research Bulletin, Issues 18-19

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Research Institute of Prakrit, Jainology and Ahimsa, 2005 - Jaina literature
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Contents

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1
Section 2
37
Section 3
63

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अत अनेक अन्य अपनी अपने अपरिग्रह अर्थ अर्थात् अहिंसा आचार्य आत्मा आदि इन इन्द्र इस प्रकार इसमें इसी उनका उनके उन्होंने उस उसे एक एवं कर करता है करते हुए करना करने कर्म कहते कहा गया का किन्तु किया गया है किया है किसी की के रूप में के लिए के साथ को कोई गया है कि गये गाथा ग्रन्थ जन्य जा जाता है जी जीव जीवन जैन जो ज्ञान डै तक तथा तीर्थकर तो था थी थे दिया दीक्षा दृष्टि देश दो दोनों द्वारा धर्म ध्यान नक्षत्र नगर नहीं नहीं है नाम ने पर पृ० प्राकृत प्राप्त बतलाया भगवान् महाबीर भी मन मनुष्य महाबीर के में में भी मोक्ष यर यह यहाँ या ये रने वर्धमान वर्ष वह वही वाराणसी विदेह वे वैशाली श्री संस्कृत सकता है सभी समय सूत्र से स्थान ही हुआ है और है कि हैं हो होता है होती होते होने

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