Śrīmadbhagavadgītā

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Shankar Lal Kaushalya, Śrīkr̥ṣṇa Panta
Acyutagranthamālā-kāryālayaḥ, 1967 - 944 pages
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अत अथवा अन्य अपने अब आत्मा आदि इति इत्यादि इस प्रकार इसलिए इससे उक्त उत्पन्न उन उनके उस उसका उसके उससे एक एव एवं ऐसा ऐसी कर करके करता है करते हैं करना चाहिए करनेके लिए करनेवाले कर्तव्य कर्म कहते कहा कि किन्तु किया किये की के को कोई क्या क्योंकि गया गये जा जाता है जिस जैसे जो ज्ञान तथा तुम तो देह दो द्वारा न तु ननु नहीं है नहीं होता नित्य निरूपण पर परम पुरुष प्रतिपादन प्राप्त प्राप्त होता है फल बहा ब्रह्म भवति भी मुक्ति मैं यति यथा यदि यम यह अर्थ है या यानी युक्त नहीं है ये रहित रा वह वा विषय वे वेद वैसे श्रुति संन्यास सकता सदा सब समान सम्पूर्ण सर्वत्र सिद्ध से स्थित स्वयं ही है हुआ हुए हूँ है और हैं हो होकर होता है होती होते होनेके कारण होनेपर होनेसे

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