Samakālīna sāhitya, eka naī dr̥shṭi: āja ke Hindī lekhana kī pramukha vidhāoṃ aura ullekhanīya racanāoṃ para eka naī dr̥shṭi

Front Cover
Lipi Prakāśana, 1977 - Hindi literature - 242 pages
0 Reviews

From inside the book

What people are saying - Write a review

We haven't found any reviews in the usual places.

Contents

Section 1
Section 2
Section 3

19 other sections not shown

Common terms and phrases

अज्ञेय अधिक अपनी अपने अब आज आधार पर आधुनिकता आधुनिकता की आलोचक आलोचना इतना इन इनकी इनके इस उपन्यास इस तरह इसका इसकी इसके इसमें इसलिए इसी इसे उपन्यास की उपन्यास में उस उसकी उसके उसे एक कर करता है करना करने कविता कहा कहानी का का बोध काम कालिदास किया गया है की की कोशिश की गवाही की है कुछ कृति के लिए केवल को क्या गया है जब जा सकता है जाए जाता है जाती जिस तरह जीवन तक तो कभी था दिया देता है देने दोनों नई नहीं है नाम निराला ने पंजाब पर परिवेश पहले प्रक्रिया प्रेमचन्द बात भी में है मोहन राकेश यदि यह या रचना रहा है लगता है लेकिन लेखक वह वास्तव शायद सकती समकालीन समस्या से स्तर पर हर हिन्दी ही हुआ है है और है कि है जो है तो है है हैं हो सकता होकर होता है होती होने

Bibliographic information