Gīta qalama meṃ banda haiṃ

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Śāradā Prakāśana, 1968 - 84 pages
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अगर अपना अपनी अपने अब आँसू आज इस उस उसको उसे एक ऐसा ओर और कब कर करता करते करने कल कविता-संग्रह कसी कहीं का कि किया किसी की कुछ के केवल को कोई क्या खुद गये गीत गीतों चाहे छोर जग जब जा जाता जाती है जाते जाना जिन्दगी जीवन जो तक तुम तुमने तेरी तेरे तो था थी थे दरवाजे दर्द दिया दिल दुख दुनिया देख देखा देती नजर नहीं है निज नित नीर ने पर पाया पीर प्यार प्रान फागुन फिर बदनाम बदल बन गया बात भर भी मजदूर मत मन मुझे में मेरा मेरी मेरे मैं मैंने मौत यह यहीं रह रहा रहीं रहे रूप लगता लिए लिया ले लेकर क्या लेता वह वहीं वे सं सपने सपनों की सब समय साथ सान से स्वयं स्वर हम हर हाथ हार ही हुए हूँ है और है जो हैं हो होगी होठों होता

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