Citrāṅgadā: Kavi Sumitrānandana Panta. 1. saṃskaraṇa

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Rājapāla, 1969 - Hindi poetry - 207 pages
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अंचल अंतर अधरों अपने अब अमर आज आत्मा इन्द्र इस उयों उर में एक और कर करता करती करते का की के को कोन कोमल कौन क्या क्षण गया गिरि गीत घन चंचल चल चिर चेतना छवि छाया जग जन जब जल जीवन का जो झर तन तम तमस तुम तुम्हारी तो था थी थे दीपित देख धर धरा नभ नव नहीं निज निर्भर नील नूतन ने पग पथ पर प्रकाश प्रकृति प्रति प्राण प्राणों प्रिय प्रेम प्रेयसी फिर बन भर भारत भाव भी भू पर मधु मधुर मन मन में मर मानव मुख मेरे मैं मौन यह युग रंग रज रजत रस रहा रही रहीं रहे रा रूप रे लहरों वन वह विश्व शत शशि शाश्वत शिखर शिखरों शोभा सत्य सा सित सी सुख से सौन्दर्य सौरभ स्थानों स्थित स्पर्श स्वणिम स्वप्न स्वर स्वर्ग हिम ही हृदय है है है हैं हो होगी ह्रदय

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