Vidyāpati, Sūra, Bihārī kā kāvya saundarya

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Cintana Prakāśana, 1989 - Hindi poetry - 358 pages
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अत अधिक अनेक अपनी अपने आदि इन इस इसमें इसी उद्धव उनका उनकी उनके उन्हें उन्होंने उस उसका उसकी उसके उसमें उसे एक एवं ऐसा और कर करती करते करना करने कवि कवियों कहा का का वर्णन काव्य किया है किसी कुछ कुष्ण कृष्ण कृष्ण के के कारण के लिए के साथ को क्या गया है गयी गये गोपियों गोपियों के जयदेव जा जाता है जैसे जो तक तो था थी थे दिया दृष्टि दोनों नहीं नायक नायिका नायिका के ने पद पदावली पर पूर्ण प्रकृति प्रयोग प्रिय प्रेम बन बिहारी बिहारी ने भक्ति भाव भाषा भी भ्रमरगीत मन यह या रचना रहा है रही रहे राधा राधा के रूप में वह वाले विद्यापति की विरह वे श्रीकृष्ण श्रृंगार सकता सतसई सभी समय साहित्य सूर सूरदास से हिन्दी साहित्य ही हुआ है हुई हुए हृदय है और है कि है है हैं हो होकर होता है होती होने

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