Devāgama: aparanāma, Āpta-mīmāṃsā

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VīrasevāmandiraṬrasṭa, 1978 - Jaina philosophy - 135 pages
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Philosophical hymn setting forth the Jain epistemological approach to verbal testimony.

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अत अथवा अन्य अपने अपेक्षा अभाव अर्थ आदि इन इस इस तरह इससे उक्त उन उनका उनके उनमें उन्हें उपस्थित उस उसका उसकी उसके उसे एक एकान्त एवं ऐसा और न कथन कर करता करते कहना कहा जाय कि का कारण कारिका कार्य किया किया है किसी की के को कोई क्योंकि गया है घटित जब जाता है जैसे जो तत्व तथा तब था दो दोनों दोष द्वारा धर्म नहीं बन नहीं बनता नहीं है नहीं होता पर परस्पर प्रमाण प्राप्त बन सकता बनती बिना भिन्न भी भेद में मोक्ष यदि यह यह कहा जाय यहाँ या ये रा रूप रूपमें लिए लिये वस्तु विरोध विषय वे व्यवस्था शब्द सकता है सकती सदोषता सब सर्वथा साथ सिद्ध स्वीकार ही नहीं हुआ हुए हेतु है और है कि है तो है वह है है हैं हो होता है होती होनेपर होनेसे

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