Muktidūta : eka pauraṇika romāṃsa

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Bhāratīya Jānapīṭha, 1950 - Hindi fiction - 336 pages
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अंजना अंजनाको अनेक अपना अपनी अपने अपनेको अब आई आकर आज आप आया आये इन इस उठा उठी उन उनका उनकी उनके उन्हें उन्होंने उस उसका उसकी उसके उसने उसी उसे ऊपर एक एकाएक ओर और कर कहीं कि किया किसी की कुछ कुमार केवल कोई क्या क्षण गई है गया है गये चल चली चारों ओर जब जा जाकर जाता जाती है जाना जाने जीजी जैसे जो तब तुम तुम्हारे तो था थी थे दिन दिया दी दूर देख देखा दो दोनों नहीं है पड़ पडी पर पवन-जय पा पास प्रहस्त फिर बहुत बात बार बीच भर भी भीतर मन मानों मुझे मेरे मैं यदि यह ये रह रहा है रही रहीं रहे हैं रावण लगा लगी लिया लिये ले लेकर वसंत वह वहीं वे सब साथ सामने सारी सारे स्वयं हाथ ही हुआ हुई हुए हूँ है और हैं हो गई हो गया होकर होगा

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