Kāmāyanī meṃ śabdaśakti-camatkāra

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Hindī Sāhitya Saṃsāra, 1963 - 159 pages
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अनेक अपनी अपने अब अर्थ अलंकार है आकाश आनन्द आरोप इस इस प्रकार इसका इसमें इससे इसी उपमा उस उसके उसी प्रकार उसे एक एवं कर करता करती है कह कहा गया है कामायनी काव्य कि जिस प्रकार किया गया की की गई है के कारण के लिए को कोई गया है गौणी जब जाता है जाती जीवन जो तथा तुम तो था थी थे दो ध्वनित नहीं नील ने पद्य पर प्रयोजनवती पृष्ट बन बिन्दू भी मधुर मन मनु में भी में रूपक मैं यह भाव यह है कि यहाँ या ये रहा है कि रही रहे रूप में लक्षणा वह वही वहीं व्यक्त हो विश्व वे शब्द श्रद्धा सम्बन्ध सा सादृश्य सी सुख सुन्दर सूर्य से तात्पर्य से यह ह्रदय ही हुआ हुई हुए हृदय है अत है और है क्योंकि है है हैं हो रहा है होता है होती होते होने से

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