Chatrapatiḥ Śrīśivarājaḥ

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Devavāṇīmandiram, 1974 - 128 pages
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१ ० १० ९० अच्छा अत अथ अपि आत इति इति है ईई उगी एम एव और औरोपन्त कर्ष का कावी कि की कुत्र कृते के केवलं को खलु गं गता च है जाने णइ तत्र तथा तथापि तदा तदेव तव तस्य ता तानाजी तार तु ते तेन तो था दिवं देवा देवी द्वारपाल न तु न ते न हि ननु ननु है नीरा नेताजी पुन प्र प्रजा प्रविशति प्रविश्य बालाजी भवता भवति भवती भवतु भवनों भवान भवानी भी मन्यते मम मया महामात्य महाराजा मा माता मे में मैं यत्र यथा यदा या रमा रा रा १ राजा वर्तते वा विजयते विना शिवराज श्रीराम संस्कृत सदा समर्थ समें सर्व सह सा सार्थ से स् स्वयं स्वराज्य स्वस्थ्य हि ही है अतो है कि है जिजामाता है तत्र है न है मोरोपन्त है शिवराजा है है हैं

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