Prayogavāda aura nayī kavitā

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Samakālīna Prakāśana, 1966 - Hindi poetry - 306 pages
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अज्ञेय अधिक अनुभूति अपनी अपने अभिव्यक्ति अर्थ आज आदि आधुनिक आस्था इन इस तरह इसी उत्पन्न उनका उनकी उनके उनमें उन्हें उन्होंने उस उसकी उसके उसमें उसे एक ऐसी ऐसे ओर कर करता है करते करने कवि कविता में कविताओं में कवियों कहा का काव्य किन्तु किया है किसी की कुछ के कारण के रूप में के लिए केदारनाथ केवल को कोई गया है गीत गीतों चेतना छायावादी जब जाता है जाती जीवन के तक तथा तो था थी थे दिखाई पड़ता दिया दोनों द्वारा नयी कविता नयी कविता के नये नवीन नहीं है ने पड़ता है पर प्रकार प्रयोग प्रयोगवादी प्रवृति बहुत बात बाद बिम्बों भाषा भी में भी मैं यदि यह या युग ये रहा वर्तमान वह वे व्यक्ति सत्य सभी सम्बन्ध सामाजिक साहित्य से ही हुआ हुई है हुए हूँ है और है कि है जो है है हैं हो गयी होता है होती होते होने

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