Gadala aura kanya kahāniyām̐

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Kitāba Ghara, 1992 - 220 pages
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अपना अपनी अपने अब अभी आज आदमी आनन्द आप आया इस उठा उठी उनकी उनके उन्होंने उस उसका उसकी उसके उसने उसी उसे एक और कभी कर करके करता करते करने का काम कि किन्तु किया किसी की की ओर कुछ के लिए को कोई क्या क्यों गई गए गदल गया था घर चला चली जब जा जाता जाने जी जीवन जैसे जो डॉक्टर तक तब तरह तुम तू तो थी थीं थे दिन दिया दी दे देख देखकर देखा दो नहीं ने कहा पर पानी पास पूछा फिर बरगद बात बाबू बाहर भिक्षु भी मन मुझे में मेरी मेरे मैं मैंने मैना यह यहाँ रहा था रहा है रही थी रहीं रहे थे रात लगा लगी लगे लिया ले लोग वह वहीं वे संघस्थविर सकता सब समय सामने साहब सिर से स्वर हम हाथ ही हुआ हुई हुए हूँ है है कि हैं हो गया होकर

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