Dīpakoṃ ke deśa meṃ Bhārata bhūmi para kāvya-saṅkalana

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Siddhārtha Pablikeśansa, 1996 - Poetry - 152 pages
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अपना अपनी अपने अब अभी आई आप इस उगे उन उन्हें उस उसी एक एव और कते कहीं का कि किए किसी की के लिए को क्षण खेत गंगा गई गीत गुजरात गोबर गोल चाहता है चाहे छोर जब जा जात जिस जी जो तक तने तब तव तहे तू तेरा तेरी तेरे तो थी दिन दूसरे दृष्टि देता देती देय दो दोनों धरती धान धार धुम नई नहीं नाम निहारा नीम ने पर पाए पाल पी पीत पुन प्राणों प्राय फल बन बने बहे बाद बाल बाली बिना बिहार भर भाई भारत भी भोजपुरी मत मन माता मात्र मुझे मेया मेरा मेरी मेरे मोर यदि यम यया यर यह यहीं या रहे रा राई रात राम लगे वह वहीं शत शिवपुरी शिवपुरी में श्री सदा सब सम साज सी से हम हर हिन्दी हिन्दी में ही हुआ हुई हुए है हैं हो होता होती

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