Saṅgrāma: eka sāmājika nāṭaka

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Sarasvatī Presa, 1967 - Hindi drama - 198 pages
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अगर अपना अपनी अपने अब अभी आज आत्मा आदमी आप इतना इतनी इस इसी ईश्वर उनकी उनके उन्हें उस उसका उसकी उसके उसे एक ऐसा और कभी करता करते करना करने कह कहाँ कहीं का काम किया किसी की कुछ के लिए केवल कैसे को कोई कौन क्या क्यों गयी गये घर चाहता चाहिए चाहे जब जा जाता है जाती जाते जान जाये जायेगा जी जो ज्ञानी तक तरह तुम तुम्हारे तुम्हे तो था थी थे दया दिन दिया दे देना दो दोनों न जाने नहीं है ने पर प्रेम फिर बहुत बात भाई भी मन में मालूम मुँह मुझे मेरा मेरी मेरे मैं मैंने यह यहाँ यहीं रहा है रहीं रहे राजेश्वरी रुपये लगा लगान लिया ले लेकिन लोग वह वहाँ सकता सकती सब सबलसिंह साथ सिर से हलधर हाथ ही हुआ हुई हुए हूँ है कि है है हैं हो कर हो गया होगा होगी होती

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