Akhā kī Hindī kavitā: sampādaka evaṃ vyākhyā viśleshaṇa aura vivecana

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Nāgarīpracāriṇī Sabhā, Kāśī, 1989 - Hindi poetry - 638 pages
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Hindi poetry of Akhā, 17th century Gujarati and Hindi poet; a study, with text of poems.

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१० ३६२ अखा की अखा ने अनुभव अनेक अन्य अपना अपनी अपने अर्थात् आत्मा आप इस इसी उपनिषद उसका उसकी उसके उसने उसे एक एवं ऐसा ओर कबीर कर करके करता है करते करना करने कहा का काव्य किया किया है किसी कुछ के कारण के लिए को कोई क्या क्योंकि गई गया है गुजराती गुरु जब जाती जाय जीव जीवन जो ज्ञान तब तो था दिया दृष्टि देता है दो दोनों द्वारा नहीं है पद पर परंतु परम परमात्मा परमात्मा का प्रकार प्राप्त प्रेम फिर बात भक्ति भगवान भी मन मनुष्य मात्र माने माया में मैं यह या ये रचना रहता है रहा राम रे वर्णन वह विषय वे व्यक्त श्रीकृष्ण संत संसार सकता सत्य सब से सो स्वयं स्वरूप हिंदी ही हुआ हुए हूँ है और है कि है है हैं हो जाता है होकर होता है होती होने के

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