Panta kī kāvya sādhanā: 'Raśmi bandha' aura 'Tārāpatha' ke sandarbha meṃ, pramukha kavitāoṃ kī vyākhyā sāhita

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Sāhitya Niketana, 1975 - 218 pages
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अपनी अपने अब अर्थात आकाश आत्मा इन इस इस प्रकार उस उसका उसकी उसके उसी प्रकार उसे एक एवं ओर कथन है कि कभी कया कर करके करता है करती करते हुए करने कवि का कवि ने कविता का कथन है काव्य किन्तु किया है किसी की के कारण के प्रति के रूप में के लिए के समान को गया है गयी चित्रण चेतना छाया जगत जब जल जा जाता है जाती जाते जिस प्रकार जीवन के जैसे जो तक तथा तुम तुम्हारे तो था थी थे दर्शन दिया दृष्टि नहीं पंत पर परिवर्तन प्रकार प्रकृति प्रतीत प्रदान प्रस्तुत प्रेम भावना भी मन मानव में कवि मैं यह युग रहता रहती रहा है रही रहे रूपी वह विश्व वे व्यक्त संसार सुख सुन्दर से सौन्दर्य हम हिमालय ही हुआ हुई हृदय है और है तथा है है हैं हो जाता होकर होता है होती होते होने

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