Nadī pyāsī thī

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Vidyā Prakāśana Mandira, 1988 - Hindi drama - 103 pages
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अपनी अपने अब आग आगन्तुक आज आत्मा आता है आती आदमी आप आपको इस उस उसकी उसके उसे एक कभी कर करता करती है क्या क्यों का कि कितनी किया किसी की ओर की तरह कुछ कुर्ती कृष्ण के के लिए को कोई गई जब जहाँगीर जाता है जाती जाने जिन्दगी जी जैसे जो झील तक तुम तुमने तुम्हारे तुम्हें तो था थी थे दिन दिया दिवाकर दे देखता देता देती है दो धीरे-धीरे नहीं नहीं है ने पदमा पर परमा प्यार पास पीछे फिर बहुत बाजोरिया बात बैठ भर भी भीड़ मगर मत मन माँ मुझे मेरा मेरी मेरे मेहर में मैं मैंने यह यहाँ ये रख रहा है रही रहीं रहे हैं राजेश लगता है लाडली ले लेकर लेकिन लोग वह व्यक्ति शंकर शीला सब सर स्वर से हम हाथ हाँ ही हुआ हुई हुए हूँ है और है है हैं हो जाता होता होती

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