Stotrāvalī

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Śrīyaśobhāratījainaprakāśanasamitiḥ, 1975 - Jaina poetry - 372 pages
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अत अता अथवा अनेक अन्य अपनी अपने अर्थात् आत्मा आदि आप आपकी आपके आश्रय इन इस इस प्रकार उक्त उत्पन्न उन उपाध्याय उस उसका उसके उसी उसे एक एवं ऐसा ऐसे कर करके करता है करते हैं करने करने के करनेवाले कहा का कार्य किन्तु किया किसी की कुछ के कारण के लिए के लिये के समान के साथ को को प्राप्त कोई क्या क्योंकि गई गया है गुजराती चन्द्रमा जन्म जब जाता है जिस जैन जैसे जो ज्ञान तथा तब तो था दोनों द्रव्य धर्म नहीं है नाम ने पद्य पर प्रकार प्रति प्राप्त भगवान् भेद माना में भी मैं मोक्ष यदि यह यहाँ वस्तु वह वृक्ष वे शब्द शरीर श्री सकता है सकती सभी समय समस्त सम्बन्ध सिद्धि सूर्य स्तुति स्वीत्र ही हुआ हुई हुए हे हे देव है और है कि है है हो सकता होकर होगा होता है होती होने से

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