Kanupriyā

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Bhāratīya Jānapīṭha, 1959 - 89 pages
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अक्सर अगर अथाह अनन्त अपनी अपने अब आज आम के इतिहास इन इस उस उसी उसे एक और तुम कनु कभी करती कह कहा है क्या क्यों क्षण का कि तुम कि मैं कितना कितनी बार की तरह कुछ के केवल को कोई गया गयी गये गीत जब तुमने जा जाती जिस्म जिसे जो तक तन तन्मयता तुमने तुमने मुझे तुम्हारे तुम्हें तो तो मैं था थी दिन दिया है दो नहीं नहीं आयी नहीं है नीचे पर प्यार प्रगाढ़ प्रतीक्षा प्राण प्रिय पाती पास फिर बन बिना बीर भय भी भेरी मन मर मात्र मान मुझे मेरा मेरी मेरे में में तुम्हारे मैरी मैरे मैंने यमुना यह या ये रही रहे थे लगता है लिया ले वह शब्द सब समझ समय समुद्र सा सारे सिर्फ सी सुनो सृष्टि से सो हर ही हुआ हुई हुए हूँ और हूं है और है और मैं है कि हैं हो होकर

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