Ina dinoṃ

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Mukti Prakāśana, 1990 - Hindi poetry - 108 pages
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अनेक अपना अपनी अपने अब अस्तित्व आकाश आग आज आदमी इतिहास इस उस उसकी उसके उसे एक ऐसे ओर कई कभी कर कविता कविताएं का कि किसी की तरह कुछ के बाद के बीच के लिए के साथ कैसे को कोई क्या गया है गये चाहता जन्म जब जमीन जहाँ जा जाता है जाने जो तक तथा तब तुम तुम्हारी तुम्हें तो था थी थे दिन दिया दे देह देहरादून दो धरती नदी नहीं नहीं है ने पत्र-पत्रिकाओं में पर पहाड़ प्रकाशित सम्पर्क फिर बन बहुत बाहर बीज भी भीतर मन मात्र मुझे में में प्रकाशित मेरा मेरी मेरे मैं मैंने यम यह यही या युद्ध ये रह रहा है रही रहीं रहे हैं रा रात लगता है लगा लोग वह वे शब्द शहर सब समय सा से हम हर हाथ ही हुआ हुई हुए हूँ है और है है हो होता है होती होते होने

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