Mahābhāratī

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Kiraṇakuja, 1968 - 559 pages
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Poem in praise of India's Vedic age.

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अति अधिक अपनी अब अभी आई आज इस उठी उर उर्वशी उस ऋषि एक ओर और कभी कर करता करती कल्पना कहाँ कहीं का कि कितना किन्तु किया किस किसी की कुछ के के लिए केवल कैसे को कोई कौन क्या क्यों क्षण गई गए चेतना जब जल जहाँ जाता जाती जीवन जो ज्ञान ज्यों तक तन तब तुम तो था थी थे दिन दिया दूर दृग दृष्टि देख दो नयन नयनों नव नहीं नित नूतन ने पथ पर प्रकाश प्रथम प्राण प्राप्त प्रिय फिर बन बना भर भरत भारत भू मत मन मन की मन में मानव मुझे में भी मेरा मेरी मेरे मैं मैंने मौन यदि यह यहाँ रम्भा रहा रही रहे रात रे लगा लोचन वसिष्ठ वह वहाँ विश्वामित्र वे व्याप्त शकुन्तला शक्ति संभव सकी सत्य सदा समय सुन से ही स्मरण स्वयं स्वयम् हुआ हुई हूँ है हैं हो गई हो गया होगा होता

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