Maiṃ tumhārā svara

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An̄jali Prakāśana - 150 pages
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मंगल सक्सेना का गीत-गंधों के देवता !
गंधों के देवता !
फिर मुझे सँवार लो !!
संकरी सुविधाओं से
फिर मुझे बुहार लो !!
गली-गली, चौराहे, नीमों पर झूल रहे
ओ मेरे संबंधी ! मुझको ही भूल रहे
आवारा सज्जनता !
मुझे भी उबार लो !!
जीने से ऊब गया
अंगना उतार लो !
गंधों के देवता !
तुम तो सर्वांग मधुर वास बने रहते हो
देते हो तृप्ति और प्यास बने रहते हो
सुखदायी आकुलता !
अब मुझे पुकार लो
तन-मन तो टूट रहा
प्राण भी उधार लो !
गंधों के देवता!
फिर मुझे सँवार लो !
-मंगल सक्सेना
('मैं तुम्हारा स्वर' काव्य संग्रह)
 

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अगर अपना अपनी अपने अब आँसू आज आया इतना इस एक ऐसा ऐसी कभी कर करते कह का किया है किसी की की तरह कुछ के कैसा कैसे को कोई क्या क्योंकि गगन गया गीत चेतना जब जाए जाता हूँ जाती है जाने जिन्दगी जीवन जैसे जो तक तुम तुमने दिया तुम्हारा तू तेरी तेरे था दर्द दिन दिया दे उपदेश देखा देश देह दो नई नजर नया नहीं ने पता पर प्यार प्यास प्राण फिर भी बन बहुत बात भर भरा भारत मगर मन मिली मुझको मुझे में मेरा मेरी मेरे मैं तो अपने यह यहीं या युग युद्ध ये रहा रहे रात लिए लिया लिये ले लेकिन लोग वह वहीं वाली वाले विराट वे सत्य सब सभी साथ साथी सुख से हम हमने हमारी हमारे हमें हर हिमालय ही हुआ हुए हूँ मैं हृदय है और है कि है मैंने हैं हो होगा होता

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