Ādhunika kavi Panta: Samīkshā evaṃ vyākhyā

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Aśoka Prakāśana, 1963
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अत अत्यन्त अपनी अपने अर्थात् अलंकार आकाश इस इस प्रकार इसी उस उसकी उसके उसी प्रकार उसे एक एवं ओर कर करके करता करते करने कल्पना कवि की कवि ने कविता कहता है कि का काव्य किन्तु किया है किसी की कुछ के कारण के प्रति के लिए के समान केवल को कोई गई गया है चेतना छायावादी जब जा जाता है जाती जिस प्रकार जीवन की तक तथा तुम तुम्हारे तो था थी थे दिया दृष्टि नवीन नहीं पन्त पन्तजी पर पंक्तियों में प्रकार प्रकृति प्रकृति के प्रयोग प्रेम बन भारत भाव भाषा भी मन मनुष्य मानव मानो मेरे में में कवि में भी मैं यह रहा है रहे रूप रूप में वह विशेष वे शब्द शब्दों समय संसार सुन्दर सूर्य से सौन्दर्य हम ही हुआ हुआ है हुई हुए हूँ हृदय है और है कि है है हैं हो होकर होता है होती होने

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