Ākāśa vibhājita hai

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Jagata Śaṅkhadhara, 1965 - 69 pages
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अगर अपना अपनी अपने अब अमरीका अंतर आकाश आज इन्सान इलाहाबाद इस उड़ उपग्रह उस उसकी उसके एलेन और मैं और सागर कन्याकुमारी कबीर कभी कर कलकत्ता कहा क्यारियों का कि की तरह के बीच के लिये को को है कोई गया है गये गो है जब जल जहाँ जा जाता जिसे जो तक तट तन तुम तुमने तुम्हारी तैरते था थी थे दिया था दिया है दिशा में दी दूसरे देख देखा देश दो नहीं है नारद निराला ने पर प्रेमचंद पीले फिर फूल बादल भी भेरा भेरी मन मुझे मेरा मेरी मेरे मैं एक मैंने यमुना यह या रथ रहा हूँ रहा है और रही रहीं रहे रंग रा राग लाल वसंत वह विशाल शमशेर सड़क पर सब सा सागर में सारनाथ सी से हम हमारा हमारे हाथ ही हुआ हुई हुए हूँ और है जो है मैं है सागर हैं हो

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