गोस्वामी तुलसीदास (Hindi Epic): Goswami Tulsidas(Hindi Epic)

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पद्य में कहानी कहने की प्रथा प्राचीनकाल से प्रचलित है। प्रस्तुत कविता भी एक कथा-वस्तु को लेकर निर्मित हुई है। गोस्वामी तुलसीदास किस प्रकार अपनी स्त्री पर अत्यधिक आसक्त थे, और बाद को उसी के द्वारा उन्हें किस प्रकार राम की भक्ति का निर्देश हुआ,--यह कथा जन-साधारण में प्रचलित है। इसी कथा की नींव पर कवि ने इस लम्बी कविता की रचना की है; कारण यह है कि उसने कथा-तत्त्व में और बहुत-सी बातें देखी हैं जो जन-साधारण की दृष्टि से ओझल रही हैं। तुलसी का प्रथम अध्ययन, पश्चात् पूर्व संस्कारों का उदय, प्रकति-दर्शन और जिज्ञासा, नारी से मोह, मानसिक संघर्ष और अंत में नारी द्वारा ही विजय आदि वे मनोवैज्ञानिक समस्याएँ हैं जिन्हें लेकर कवि ने कथा को विस्तार दिया है। यहाँ रहस्यवाद से सम्बन्ध रखनेवाली भावना-प्रणाली विश्लेषण करना कवि का इष्ट रहा है। कथा को प्राधान्य देने वाली कविताएँ हिंदी में शतश: हैं; मनोविज्ञान को आधार मान पद्ध में लिखी जानेवाली कविताओं में यह एक ही है।.... इस तरह हिंदी जाति के सबसे बड़े जातीय कवि की जीवन-कथा के द्वारा निराला ने अपनी समसामयिक परिस्थितियों में रास्ता निकालने का संकेत दिया है

 

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Section 3

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अपनी अपने अब आज आभा आया इस उनकी उन्हें उर उस उसका उसके उसने उसी ऊपर एक ओर और कथा कर करने कहता कहाँ का किव की किव ने किवता की कुछ के साथ के िलए केवल को क्या गए गया गयी गये घर चल छन्द छाया छिव जड़ जन जब जल जाते जाने जीवन के जैसे जो ज्यों तक तरह तुलसी तुलसीदास था थे दल दुख दृिष्ट दे देखा देश द्वारा नयन नहीं पर पर्कृित पर्खर पर्थम पर्ाण पर्ेयसी पहले पार पिरचय पृथ्वी बँध बँधा बहती बाहर बोली भर भारत भारती भाव भावों भी भीतर मधुर मन में मोह यमुना यह यहाँ यों रत्नावली रह रही रहे राम रूप रे लख लौटे वह वही वे संस्कृित संिचत सकल सत्य सब सभ्यता सूयर् से स्तर स्वयं स्वर हम ही हुआ हुआ है हुई हुए हैं हो िक िकया है िकस पर्कार िजस िदन िदया िनज िनराला िपर्या िफर िवश◌्व

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