Adhyayana aura anusandhāna

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Pragati Prakāśana, 1975 - Poetry - 156 pages
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अत अध्ययन और अपनी अपने अयोध्या आज आत्मा आदि इस इस प्रकार ईश्वर उनका उनकी उनके उर्वशी उस उसका उसकी उसके उसे एक एवं ओर कबीर कभी कर करके करता है करती करते करना करने कवि कवि की कविता कवियों का काम कारण काव्य किन्तु किया है किसी की कुछ कृष्ण के प्रति के लिए के साथ को गया है गयी चेतना जगत जा जाता है जाती जीव जीवन जैसे जो तक तथा था दर्शन दिया दृष्टि दोनों द्वारा नहीं नहीं है नारी निराला ने पर परमात्मा प्रकट प्रकृति प्रतीक प्रस्तुत प्राप्त प्रेम बन बिम्ब ब्रह्म भारत भारतीय भावना भी मन मनुष्य मानव मानवता माया मीरा में भी मैं यह यहाँ या युग रहा राम रूप में वह विकास विचार वे संसार सत्य सब समय सुन्दर से सौन्दर्य स्वरूप हम ही हुआ है हुई हुए हृदय है और है कि है है हैं हो होता है होती होते होने

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