Andhere Band Kamare

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Rajkamal Prakashan, Sep 1, 2008 - 329 pages

वर्तमान भारतीय समाज का अभिजात नागर मन दो हिस्सों में विभाजित हैदृएक में है पश्चिमी आधुनिकतावाद और दूसरे में वंशानुगत संस्कारवाद। इससे इस वर्ग के भीतर का द्वन्द्व पैदा होता है, उससे पूर्णता के बीच रिक्तता, स्वच्छन्दता के बीच अवरोध और प्रकाश के बीच अन्धकार आ खड़ा होता है। परिणामतः व्यक्ति ऊबने लगता है, भीतर ही भीतर क्रोध, ईर्ष्या और सन्देह जकड़ लेते हैं उसे, अपने ही लिए अजनबी हो उठता है वह, और तब इसे हम हरबंस की शक्ल में पहचानते हैंदृहरबंस इस उपन्यास का केन्द्रीय पात्र, जो दाम्पत्य सम्बन्धों की सहज रागात्मकता, ऊष्मा और अर्थवत्ता की तलाश में भटक रहा है। हरबंस और नीलिमा के माध्यम से पारस्परिक ईमानदारी, भावनात्मक लगाव और मानसिक समदृष्टि से रिक्त दाम्पत्य जीवन का यहाँ प्रभावशाली चित्रण हुआ है। अपनी पहचान के लिए पहचानहीन होते जा रहे भारतीय अभिजातवर्ग की भौतिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक महत्त्वाकांक्षाओं के अँधेरे बन्द कमरों को खोलनेवाला यह उपन्यास हिन्दी की विशिष्टतम कथाकृतियों में गण्य है। 

 

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Contents

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Common terms and phrases

अच्छा अपना अपनी अपने अब अभी आज इस तरह इसलिए उन उस उसका उसकी उसके उसने उससे उसी उसे एक कभी कर करता करने कह कहता कहा का काम कि मैं कि वह किसी की की बात कुछ के लिए के साथ को कोई क्या क्यों गया गयी घर चला चाहता चाहिए जब जा जाता है जाती जाने जैसे जो ठकुराइन ठीक तक तरफ़ तुम तुम्हारे तुम्हें तो था और था कि थी थीं थे दिन दिया दे देर दो नहीं है नीलिमा ने पता पर पहले पास फिर बहुत बात बाद बार बाहर बोली भी नहीं मगर मन मुझसे मुझे में मेरा मेरी मेरे मैंने मैंने कहा यह यहाँ या रहा था रहा है रही थी रहे लगा लिया ले लोग लोगों वह वहाँ वे शायद सकती सब समय से हम हरबंस हाथ ही हुआ हुई हुए हूँ है और है कि हैं हो हो गया होता

About the author (2008)

जन्म: 8 जनवरी, 1925; जंडीवाली गली, अमृतसर।

शिक्षा: संस्कृत में शास्त्री, अंग्रेजी में बी.ए., संस्कृत और हिन्दी में एम.ए.।

आजीविकाः   लाहौर, मुंबई, शिमला, जालंधर और दिल्ली में अध्यापन, संपादन और स्वतंत्र-लेखन।

महत्त्वपूर्ण कथाकार होने के साथ-साथ एक अप्रतिम और लोकप्रिय नाट्य-लेखक। नितांत असंभव और बेहद ईमानदार आदमी।

प्रकाशित पुस्तकें: अँधेरे बंद कमरे, अंतराल, न आने वाला कल (उपन्यास); आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस, आधे-अधूरे, पैर तले की ज़मीन (नाटक); शाकुंतल, मृच्छकटिक (अनूदित नाटक); अंडे के छिलके, अन्य एकांकी तथा बीज नाटक, रात बीतने तक तथा अन्य ध्वनि नाटक (एकांकी); क्वार्टर, पहचान, वारिस, एक घटना (कहानी-संग्रह); बक़लम खुद, परिवेश (निबन्ध); आखिरी चट्टान तक (यात्रावृत्त); एकत्र (अप्रकाशित-असंकलित रचनाएँ); बिना हाड़-मांस के आदमी (बालोपयोगी कहानी-संग्रह) तथा मोहन राकेश रचनावली (13 खंड)।

सम्मान: सर्वश्रेष्ठ नाटक और सर्वश्रेष्ठ नाटककार के संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, नेहरू फ़ेलोशिप, फि़ल्म वित्त निगम का निदेशकत्व, फि़ल्म सेंसर बोर्ड के सदस्य।

निधन: 3 दिसम्बर, 1972, नई दिल्ली।

 

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