Anupasthita loga

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Lokabhāratī Prakāśana, 1965 - Poetry - 82 pages
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अपनी कविता के अपने अभी आने आप इन इलाहाबाद इस इसे उत्तर उदास उब उस उसने एक और जब कर करता था कल का काम काव्य कि किसी की की सारी कुछ को कोई गए घर चारपाई चाहता छोटा-सा जहाँ जा जाय जाये जिन्दगी जीवन जेल में नहीं जो तत्त्व ताकि तीन तुम तुमने तुम्हें था कि थी थे दूर दृहिट दे दें देखकर दो दौड़ता धन्य नहीं है नाना पर पास प्रतिपल फर्क फिर बदली बदली उदार बन बस बार भरा भी मन मम मान मानों मिल मुक्त है मैं मुझे मुस्कराता में नहीं था मेरी मेरे मैं जेल में मैं तो मैंने यक यदि यश यह या याद ये रहा हूँ लगता है ले वर्ष बाद वर्षों वह वे शुन्य-यात्री संकल्प सदा साथ साथ-साथ से सौरभ हम हमेशा हाँ हाथ ही हुआ हुए है आज हैं हो गई होकर होता होती

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