Atmā kī ān̐khem̐

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National Publishing House, 1987 - Hindi poetry - 131 pages
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Adaptation of selected poems of David Herbert Lawrence, 1885-1930.

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अगर अपना अपनी अपने आगे आता है आती आत्मा आदमी के आप इतना इन इस इसलिए ईश्वर उनकी उन्हें उस उसका उसकी उसके उसे एक ओर और कर करता है करते हैं करो कविताओं कहाँ का काम किसी की कुछ के लिए के समान के साथ केवल को कोई कौन क्या क्यों क्रान्ति गया है गयी चाहिए चीज चेतना जब जहाँ जाता है जिन्दगी जिसे जीवन जैसे जो ठीक तक तब तरह तुम तुम्हारे तुम्हें तो था थी थे दिया दुनिया देवता दो नयी नहीं है ने पर पहले पाप प्यार प्रेम फिर फूल बन बहुत बात बिना बुर्जुआ भर भी मगर मन मर्द मुझे में मेरा मेरी मेरे मैं यन्त्र यह या यानी ये रूसी लेकिन लोग वयोंकि वह विचार वे शंख शरीर सकता सब समय से हम हमारे हमें हर हाथ ही ही नहीं हुआ हुई हुए हूँ हृदय है कि हैं हो होगा होता है

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