Aurata

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Rājapāla eṇḍa Sanza, 1992 - Fiction - 211 pages
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३ ३ अगर अपनी अपने अब अरे आज आदमी आप आपके आपको आया इस उस उसकी उसके उसने उसे एक ऐसा ओर और औरत कभी कयों कर करने कह कहा का किया किसी की की तरह कुछ के लिए के साथ को कोई कौन क्या क्यों गई गए गांव चाचा जब जहूर जा जो ठीक तक तब तिवारी तुम तुमने तुम्हारे तुम्हें तू तो था थी थे दिया दी दे देख दो दोनों नरैन जी नहीं है नाहीं ने पर पास फिर बंसल बहुत बात बार बोल भइया भाई भी भी नहीं भैया मत मियां मुझे में मेरी मेरे मैं मैंने यह यहां या रहा है रहीं रहे रहे हैं रुपया रे लगा लिया ले लोग लोगों वह वाले वे शिबू सकता सब सामने साहब से सोनवां सोबरन राय हम हमारे हरीश हां हाथ ही हुआ हुए हुजूर हूँ है कि हैं होगा होता है होती होली

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