(Baccana : vyaktitva aura kavitva)

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Sanmārga Prakāśana, 1968 - Poetry - 223 pages
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४ ४ अत अधिक अपनी अपने अब अभिव्यक्ति आज आप इन इस उनकी उनके उस उसका उसकी उसके उसे एक एवं ऐसा कभी कर करता करते करने कवि कवि की कवि ने कविता कवियों कहा कहीं का काव्य में किन्तु किया किया है किसी की कुछ कृति के प्रति के लिए के लिये को कोई क्या खडी बोली गई गया है गीत जब जा जी ने जीवन के जैसे जो तक तथा तो था थी थे दिन दिया दुख दो ध्वनि नहीं है ने पर प्रकार प्रतीक प्रयोग फिर बचन बच्चन के बच्चन जी बहुत बात भाषा भी मधु मधुशाला मन मुझे में भी मेरा मेरी मेरे मैं मैंने यह यहाँ या ये रहे रूप में लेकिन वह वे व्यक्ति शक्ति सकता है सब समय साथ स्वर हम हाला ही हुआ है हुई हुए हूँ है और है कि है है हैं हो होकर होगा होता है होती

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