Begam Meri Vishwas ( 1 To 2 )

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Lokbharti Prakashan, Sep 1, 2008 - 491 pages
भारत में अंग्रेजी राज्य की स्थापना के कालखंड पर आधारित एक वृहत महागाथा जो हमें सन् 1757 के बंगाल के प्रसिद्ध प्लासी के युद्ध के बीच लाकर खड़ा कर देती है। ‘बेगम मेरी विश्वास’ मी मराली विश्वास गाँव-देहात की एक गरीब लड़की है लेकिन कालचक्र के प्रभाव से भारत के इतिहास को बदलने में प्रमुख भूमिका निभाती है। घटना-चक्र से यही मराली विश्वास सिराजुद्दौला के हरम में पहँुचकर मरियम बेगम हो जाती हैं और बाद में क्लाइव के पास पहँुच कर बन चाती है मेरी। हिन्दू, मुसलमान और ईसाई - तीन विभिन्न धर्मों के संगम की प्रतीक बन जाती है एक मामूली सी लड़की। दो इतिहास पुरुष - सिराजुद्दौला और क्लाइव के बीच थी एक नायिका - मराली यानी बेगम मेरी विश्वास, दोनों शत्रुओं का समान रूप से विश्वास जीतने वाली। सिराजुद्दौला, क्लाइव और मराली - तीनों के माध्यम से दो शती पूर्व के बंगाल के इतिहास से दर्ज घटयाएँ अपने आप आँखों के सामने बिखर जाती हैं। सिद्ध कथाशिल्पी बिमल मित्र की जादूगरी लेखनी ने इस कथा द्वारा यह सत्य उद्घाटित किया है कि मानव-चरित्र कभी नहीं बदलता। दो सौ वर्ष पूर्व जो लोग थे वे दूसरे नामों से आज भी वर्तमान हैं और यह भी सत्य मूर्त हो उठा है कि देश के कर्णधारों के कारण ही देश का पतन नहीं होता, बल्कि जनसाधारण का सामूहिक चरित्र दोष के कारण होता है। ‘बेगम मेरी विश्वास’ एक भारतवर्ष के अतीत, वर्तमान और भविष्य का तिकोना दर्पण भी है। अनुपर्युक्त भाषा विज्ञान प्रो. श्रीवास्तव की यह पुस्तक हिंदी में उनके तीन सर्वाधिक प्रिय क्षेत्रों पर उनके चिंतन का सार है: अनुवाद-विज्ञान, भाषा-शिक्षण और शैली-विज्ञान। इस संकलन में शैली-विज्ञान से संबंधित उनके पंद्रह से ऊपर लेख हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि संकलन के सभी लेख शैली-विज्ञान की पूर्वपीठिका, उसकी सैद्धांतिक पृष्ठभूमि तथा उसके स्वरूप को वैज्ञानिक ढंग से विवेचित करने के साथ हिंदी साहित्य के विश्लेषण द्वारा शैली-विज्ञान की संक्रियात्मक प्रकृति को भी उद्घाटित करते हैं। साहित्य को ‘शाब्दिक-कला’ तथा कृति की अपनी एक ‘स्वायत्तता’ मानते हुए शैली-विज्ञान को भाषा-विज्ञान तथा काव्यशास्त्र के संधिस्थल पर स्थित कर उन्होंने शैली-विज्ञान के प्रति व्याप्त अनेक भ्रांतियों का निराकरण किया तथा साहित्य और भाषा के बीच की उस दूरी को पाटने का प्रयास किया जो भाषाशास्त्र के प्रति उदासीन आलोचकों तथा साहित्य के प्रति तटस्थ भाषाशास्त्रियों के कारण बढ़ती ही जा रही थी। शैली-विज्ञान ने निश्चित ही प्रो. श्रीवास्तव के भाषाविद् को साहित्य में प्रयुक्त अकूत भाषायी सामग्री प्रदान की तथा उनके साहित्यिक-मन को काव्य तथा भाषा के अंतर्निहित सौंदर्य को परखने की एक पद्धति। इसी प्रकार शैली-विज्ञानिक आधार द्वारा उन्होंने हिंदी भाषा की जीवंत परंपरा, उसकी साहित्यिक शैलियों तथा उसके प्रयोगगत शैलीय संदर्भों का पहली बार वैज्ञानिक विवेचन प्रस्तुत किया। संकलित आलेखों से उनके इन समस्त मंतव्यों-धारणाओं का परिचय तो मिलेगा ही, भाषा-शिक्षण में साहित्य-शिक्षण की उपादेयता तथा शैली-वैज्ञानिक विश्लेषण का महत्त्व भी स्थापित होगा।
 

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अगर अपनी अपने अब अभी अली आकर आज आदमी आप आया आये इस इसके इसी उद्धवदास उस उसके उसने उसी उसे एक और कर करने कह कहीं का कान्त कान्त ने काम कि किया किसी की कुछ के पास के लिए के साथ कैसे को कोई क्या क्यों क्लाइव गयी गये गा छोटे सरकार जरा जा जाकर जाने जैसे जो ठीक तक तभी तरह तुम तो थी थे दिन दिया दृ देखकर दो नजर नवाब नही नहीं है नानी बेगम नाम निसार ने कहा पता पर पहले फिर बात बाद बार बाहर भी भी नहीं मराली मिजो मियों मुझे मुहम्मद में मेरी मेरे मैं यह यहीं या ये रज रहा था रहा है रही रहे रा रात रानी लगा लिया ले लेकिन लोग लोगों वक्त वह वहीं वे शायद सकता सब सभी समय साहब से हम हाथ ही हुआ हुई हूं है है हैं हो गया होगा

About the author (2008)

बंगला के सुपरिचित कथाकार। जन्म: 18 मार्च 1912 को कलकत्ता में। शिक्षा: कलकत्ता विश्वविद्यालय से एम.ए.। व्यवसाय: मुख्यतः लेखन। अब तक अनेक कहानियाँ और उपन्यास लिख चुके हैं। बंगलाभाषी समाज के अलावा हिंदी व तमिल समाज में भी समान रूप से लोकप्रिय हैं। उल्लेखनीय कृतियाँ: उपन्यास: अन्यरूप, साहब बीबी गुलाम, मैं राजाबदल, परस्त्री, इकाई दहाई सैकड़ा, खरीदी कौड़ियों के मोल, मुजरिम हाजिर, पति परम गुरु, बेगम मेरी विश्वास, चलो कलकत्ता आदि। कुल लगभग 70 उपन्यासों की रचना। कहानी-संगह: पुतुल दीदी, रानी साहिबा। रेखा-चित्र: कन्यापक्ष। निधन: 2 दिसम्बर, 1991

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