Bhāratīya sāhityaśāstra aura kāvyālaṅkāra, Volume 1

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अत अतिशयोक्ति अनुप्रास अनेक अन्य अपने अर्थ अर्थालंकार अलंकार अलंकारों का अवर असम आदि इन इस इस प्रकार इसका इसी इसे उदाहरण उपमा उपमान उपमेय उल्लेख उस उसे एक ही और कर करते करने कवि कहा का का प्रयोग काव्य किया है किसी की कुछ के कारण के द्वारा के लिये के साथ केवल को कोई क्योंकि गुण चन्द्रमा जब जहाँ जाता है जाती जाय जैसे जो तथा तरह तो था थे दिया दो दोनों धर्म नहीं है निषेध ने पदार्थ पर परिणाम पाया जाता है पृ पृ० प्रकृत प्रतीति भामह भिन्न भेद मत मानते हैं मानना मुख में भी यह यहाँ यहीं या रूप में रूपक लक्षण वर्णन वस्तु वह वहाँ वाले विशेष विषय वे शब्द श्लेष संकेत संदेह सन्देह समय सादृश्य साधारण धर्म से स्पष्ट स्मरण हम ही हुए है और है कि है है हैं हो होगा होता है होती होने

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