Bhūkampa-kāvya

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Kīrttilatā Sāhitya Samiti, 1988 - Nature - 80 pages
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अगस्त अति अथ अधि अपन अल अष्टि असि अहाँ आइ उठल एक एहि कतहु कते कतेको कतोक कथा कय कयों कवि कह का कि किछु किन्तु किप की के केर कोना कोनों क्यों खसल गेल घर छल छाल छोडि जकर जखन जते जन जनक जनकपुर जनु जा जाय जे जेना टूटल ठाढ़ डा० तथा तर तो दरभंगा दिन देखल देखि देल देह धरती धरि नहि नहिं नाम निज ने नेपाल पटना पड़ल पर परक पुनि प्रकृतिक बड़ बनल बनि बल बहुत बाप बेर भए भगवान भरि भाग भी भीत भूकम्प भूमि भेल मकान मधुबनी मन मिथिला मिनट मुदा मूल में मैथिली मोतिहारी यक यम यल रहल रहि रे लहेरियासराय लागल लेल लोक लोकक वा संग सकल सड़क सन सब सभ सरकारी साहित्य सूतल से सौ हड़कम्प हम हमर हिमालय हे हेतु है हैं हो होइत

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