Bhūkampa meṃ ātmasamarpaṇa

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Amita Prakāśana, 1990 - Poetry - 90 pages
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अपना अपनी अपने अब आँखों में आई आकाश आग आदमी इतिहास इस उन उस उसकी उसके उसी उसे औरत कभी कर करता करती करो कविता का कि किन्तु किसी की तरह कुछ कुर्ती के बीच के लिए के साथ केवल को कोई क्या क्योंकि गई गया है गये गोबर घर चाहती हूँ जन्म जहाँ जा जाता जाती है जाने जिन्दगी जिसकी जिसके जीवन जो तक तुम तुम्हारे तुम्हें तो था थी थे दिन दिया देखो देश देह दो नई नदी नये नहीं है ने पर पहले पुन फिर बदल बन बना बस बार बार-बार बाहर भय भयानक भर भी भीड़ भीतर भेरी मत मन माँ मुझे मुद्रा में में एक मेरी मेरे मैं मैंने यह ये रहा है रहे राजनीति राम वर्षों वह वितस्ता विष वे सत्य सिर सुनो सूरज सूर्य से हम हर हवा हाथ ही हुआ हुई हुए है और हैं हो होगा होता है होती होने

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