Bhartiya Kavyashastra Ke Nai Chhitij

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Rajkamal Prakashan, Dec 24, 1985 - Literary Criticism - 403 pages
 

Contents

Section 1
5
Section 2
11
Section 3
15
Section 4
25
Section 5
34
Section 6
82
Section 7
97
Section 8
102
Section 19
210
Section 20
248
Section 21
253
Section 22
260
Section 23
271
Section 24
289
Section 25
300
Section 26
309

Section 9
106
Section 10
145
Section 11
155
Section 12
164
Section 13
173
Section 14
182
Section 15
190
Section 16
198
Section 17
202
Section 18
204
Section 27
318
Section 28
331
Section 29
337
Section 30
342
Section 31
355
Section 32
367
Section 33
373
Section 34
387
Section 35
400

Common terms and phrases

अतः अनुभूति अपनी अपने अभिनवगुप्त अभिव्यक्ति अर्थ अलंकार आचार्य आत्मा इन इस इस प्रकार इसी इसीलिए उनका उनकी उस उसका उसकी उसके उसी उसे एक ओर कर करता है करती करते हुए करते हैं करना करने कला कवि कविता कहते कहा है का कारण कालिदास काव्य काव्य का किया है किसी की की दृष्टि कुछ के लिए केवल को कोई क्या गया है चाहिए चिन्तन चेतना जब जहाँ जाता है जाती जाय जिस जीवन जो तक तथा तब तो था थे दर्शन दृष्टि से दो दोनों द्वारा नयी नहीं है ने पक्ष पर परम्परा प्रतिभा प्रतीक बात भारतीय भाव भाषा भी मन माध्यम मानता मानते हैं मूल में भी यदि यह यहाँ यही या ये रचना रस रहा वह वही विचार विशेष विषय वे व्यक्ति शक्ति शब्द शुक्लजी सकता है सकती सत्य सन्दर्भ में सम्बन्ध साहित्य सौन्दर्य स्पष्ट ही हुआ है और है कि हो होता है होती होने

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