Bina Deewaron Ke Ghar

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Radhakrishna Prakashan, Jan 1, 2002 - Hindi drama - 99 pages
बिना दीवारों के घर का जो घर है उसकी दीवारें हैं, लेकिन लगभग ‘न-हुईं’ सी ही। एक स्त्री के ‘अपने’ व्यक्तित्व की आँच वे नहीं सँभाल पातीं, और पुरुष, जिसको परम्परा ने घर का रक्षक, घर का स्थपति नियुक्त किया है, वह उन पिघलती दीवारों के सामने पूरी तरह असहाय ! यह समझ पाने में कतई अक्षम कि पत्नी की परिभाषित भूमिका से बाहर खिल और खुल रही इस स्त्री से क्या सम्बन्ध बने ! कैसा व्यवहार किया जाए ! और यह सारा असमंजस, सारी दुविधा और असुरक्षा एक निराधार सन्देह के रूप में फूट पड़ती है। आत्म और परपीड़न का एक अनन्त दुश्चक्र, जिसमें घर की दीवारें अन्ततः भहरा जाती हैं। स्त्री-स्वातंत्रय के संक्रमण काल का यह नाटक खास तौर पर पुरुष को सम्बोधित है और उससे एक सतत सावधानी की माँग करता है कि बदलते हुए परिदृश्य से बौरा कर वह किसी विनाशकारी संभ्रम का शिकार न हो जाए, जैसे कि इस नाटक का ‘अजित’ होता है। स्त्री-पुरुष के बीच परिस्थितिजन्य उभर जाने वाली गाँठों की परत-दर-परत पड़ताल करने वाली महत्त्वपूर्ण नाट्य- कृति है: बिना दीवारों के घर।
 

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Contents

Section 1
4
Section 2
43
Section 3
54
Section 4
62
Section 5
96

Common terms and phrases

अच्छा अजित अजित का अपनी अपने अप्पी अब अभी अरे आई आज आता आप इस उसके उसे एक एकदम ऐसा ऐसी और कभी कर करके करता करती करते करने कल कह कहा का प्रवेश काम कि किया किसी की कुछ के लिए को कोई क्या क्यों गई गए गया घर चला चली छोड़ जब जयन्त ज़रा जा जाए जाता है जाती जीजी जो ठीक तक तब तरह तुम तुम्हारी तुम्हें तो मैं था थी थे दिया देख देखती देखो दो नहीं है ने नौकर नौकरी पर पहले फिर फ़ोन बड़ी बस बहुत बात बाद बार बीच भी भीतर से मीना मुझे में मेरा मेरी मैं तो मैंने यह यहाँ यही या ये रहा है रही रही हूँ रहे लगता है लिया ले लो वह वे शायद शुक्ला शोभा सब समय सारी साहब से सो हाँ ही नहीं हुआ हुई हुए हूँ है कि हैं हो होगा होता है

About the author (2002)

भानपुरा, मध्य प्रदेश में 3 अप्रैल, 1931 को जन्मी मन्नू भंडारी को लेखन-संस्कार पिता श्री सुखसम्पतराय से विरासत में मिला। स्नातकोत्तर के उपरान्त लेखन के साथ-साथ वर्षों दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस में हिन्दी का अध्यापन। विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में प्रेमचन्द सृजनपीठ की अध्यक्ष भी रहीं। 'आपका बंटी’ और 'महाभोज’ आपकी चर्चित औपन्यासिक कृतियाँ हैं। अन्य उपन्यास हैं 'एक इंच मुस्कान’ (राजेन्द्र यादव के साथ) तथा 'स्वामी’। ये सभी उपन्यास 'सम्पूर्ण उपन्यास’ शीर्षक से एक जिल्द में भी उपलब्ध है। कहानी संग्रह हैं : एक प्लेट सैलाब, मैं हार गई, तीन निगाहों की एक तस्वीर, यही सच है, त्रिशंकु, तथा सभी कहानियों का समग्र 'सम्पूर्ण कहानियाँ’, एक कहानी यह भी उनकी आत्मकथ्यात्मक पुस्तक है जिसे उन्होंने अपनी 'लेखकीय आत्मकथा’ कहा है। महाभोज, बिना दीवारों के घर, उजली नगरी चतुर राजा नाट्य-कृतियाँ तथा बच्चों के लिए पुस्तकों में प्रमुख हैं—आसमाता (उपन्यास), आँखों देखा झूठ, कलवा (कहानी) आदि।

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