Chāyāvāda: kāvya tathā darśana

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Granthama, 1964 - Hindi poetry - 471 pages
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१० अत अथवा अपनी अपने आत्मा आदि इस प्रकार इसी ईश्वर उनके उन्होंने उपनिषद उस उसका उसकी उसके उसी उसे एक एवं ओर कर करता है करते करने कवि कवियों कहा का का कवि काव्य किन्तु किया है किसी की कुछ के कारण के लिए केवल को कोई गया है छायावाद के जगत् जा जाता है जी ने जीव जीवन के जो तक तथा तो था थी थे दर्शन द्वारा दार्शनिक दिया दृष्टि दोनों नहीं नहीं है निराला ने पन्त पर प्र प्रकृति प्रथम संस्करण प्रभाव प्रसाद प्राप्त प्रेम पृ० ब्रह्म भारत भारतीय भी मत मन मनुष्य महादेवी महादेवी वर्मा में भी मैं यह या रहा वर्मा वह वही विवेकानन्द विश्व वे वेदान्त शक्ति श्री अरविन्द शिव सत्य सब समस्त संसार स्वरूप स्वामी विवेकानन्द सुख से हम ही हुआ हुई हुए है और है कि है है हैं हो होकर होता है होने

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