Darabā: Bhojapurī kahānī-saṅgraha

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Bhojapurī Saṃsthāna, 1977 - Short stories, Bhojpuri - 72 pages
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अगर अपना अपना के अब अलका आ ऊ आँखिन के आँखिन में आइल आउर आवे ई बात उठल उनकर उनकर बाबूजी उनका के एक एगो एतना ओकरा और कपडा कम कमरा कर करत करे कवनो कह के कहानी का काम कि कि उनका की कुछ के ओर के चेहरा के बात केहू को खातिर गइल आ गइल बा गइली गबन गिलास चल चले चेहरा पर जब जाई जात जाये जिनगी के जी ठीक डाक्टर तोहरा दरद दिन दिमाग देख के देखत देखे देर नइखे नजर ना पटना बइठ बइठल बहुत बाकिर बात बानी बाप बाबूजी के बाहर बिमल बेटी भइल भर भाव भोजपुरी मन के मन में माई के मालती रंग रंजीत रजनी के रहनी रहलन रहली रहे लगलन लगे लागल ले लेखा लोग लोग के वाला सन सब सवाल सामने सूरत से हम हमरा हमरा के हमार हाथ है हैं हो गइल होई होखे

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